पं-सदासुखदासजी
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अब शरीर के अवयवों को तेरह गाथाओं द्वारा बतलाते हैं-
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अट्ठीणि हुंति तिण्णि हु सदाणि भरिदाणि कुणिममज्जाए ।
सव्वम्मि चेव देहे संधीणि हवंति तावदिया॥1033॥
अट्ठीेण हुंेत ेतण्णि हु सदोण भपरदोण कुेणममज्जाए ।
सव्वम्मि चवि दहिि संधीेण हवंेत तावेदया॥1033॥
सदासुखदासजी