मुत्तं आढयमेत्तं उच्चारस्स य हवंति छप्पच्छा ।
वीसं णहाणि दंता बत्तीसं होंति पगदीए॥1041॥
मूत्र एक आढ़क प्रमाण छह प्रस्थ प्रमाण विष्टा रहती ।
स्वाभाविक नख बीस तथा तन में रहते दाँत बत्तीस॥1041॥

  सदासुखदासजी