पं-सदासुखदासजी
किमिणो व वणो भरिदं सरीरं किमिकुलेहिं बहुगेहिं ।
सव्वं देहं अप्फंदिदूण वादा ठिदा पंच॥1042॥
इस शरीर में भरे बहुत कीड़े जैसे हो घाव सड़ा ।
पाँच वायु इस को घेरे हैं एेसा है यह अशुचि घड़ा॥1042॥
सदासुखदासजी