
कुणिमरसकुणिमगंधं सेवित्ता महिलियाए कुणिमकुडी ।
जं होंति सोचयत्ता एदं हासावहं तेसिं॥1074॥
मलमय रस दुर्गन्ध पूर्ण नारी तन का सेवन करता ।
कामी माने शुचि अपने को हास्यास्पद है यह शुचिता॥1074॥
अन्वयार्थ : अशुचि मल-रुधिरादि है रस जिसमें और अशुचि ही है गंध जिसमें - ऐसा अत्यन्त अशुचि स्त्री का शरीर, उसका सेवन करके स्वयं शुचि होता है, अपने को उज्ज्वल मानता है, उनका शुचिपना जगत में हास्य करने वाला है । ऐसी मलिन देह में आसक्त हो जो स्वयं को उज्ज्वल मानता है, वह जगत में हँसी करने योग्य होता है ।
सदासुखदासजी