
बालो अमेज्झलित्तो अमेज्झमज्झम्मि चेव जह रमदि ।
तह रमदि णरो मूढो महिलामेज्झे सयममेज्झो॥1073॥
जैसे मल से लिप्त हुआ बालक मल में ही रमता है ।
स्वयं मलिन यह मूढ़ मनुज मलमय रमणी की देह रमे॥1073॥
अन्वयार्थ : जैसे मल से लिप्त अज्ञानी बालक मल में ही रमता है, तैसे ही मूढ मनुष्य स्वयं मलिन होता हुआ अनेक अशुचिता से भरे स्त्री के शरीर में रमता है । वह ज्ञानियों के रमने योग्य नहीं है ।
सदासुखदासजी