एदे अत्थे सम्मं दोसं पिच्छंतओ णरो सधिणो ।
ससरीरे विरज्जइ किं पुण अण्णस्स देहम्मि॥1076॥
इसप्रकार तन के दोषों को भली-भाँति जो नर देखे ।
निजतन से भी हो विरक्त परतन में क्यों आसक्त रहे॥1076॥
अन्वयार्थ : इतने प्रकार से देह में (अशुचितादि को) प्रत्यक्ष देखते हुए पुरुष को ग्लानि होती है । जब अपने ही शरीर से विरक्त हो जाता है, तब दूसरों के शरीर में रागी कैसे होगा? इस प्रकार अशुचिता का वर्णन किया ।

  सदासुखदासजी