लज्जं तदो विहिसं परिजयमध णिव्विसंकिदं चेव ।
लज्जालुओ कमेणारुहंतओ होदि वीसत्थो॥1093॥
लाज छोड़ उनके समीप जा परिचय कर फिर बने निःशंक ।
इस क्रम से लज्जालु मनुज भी उनके प्रति होता विश्वस्त॥1093॥

  सदासुखदासजी