पं-सदासुखदासजी
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अब बाईस गाथाओं में स्त्री-संसर्ग से जो दोष उत्पन्न होते हैं, उन्हें कहते हैं-
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आलोयणेण हिदयं पचलदि पुरिसस्स अप्पसारस्स ।
पेच्छंतयस्स बहुसो इच्थीथणजहणवदणाणि॥1092॥
युवती नारी का मुख स्तन एवं पुष्ट नितम्बों को ।
लखे निरन्तर तो चंचल चित मानव का मन विचलित हो॥1092॥
सदासुखदासजी