उल्लावसमुल्लावएहिं चा वि अल्लियणपेच्छणेहिं तहा ।
महिलासु सइरचारिस्स मणो अचिरेण खुब्भदि हु॥1095॥
फिर हो वार्तालाप परस्पर बार-बार देखें, मिलते ।
इसप्रकार स्वच्छन्द विचर, स्वेच्छाचारी विचलित होते॥1095॥

  सदासुखदासजी