संसग्गीसम्मूढो मेहुणसहिदो मणो हु दुम्मेरो ।
पुव्वावरमगणंतो लंघेज्ज सुसीलपायारं॥1100॥
नारी-संग से मूढ़ हुआ मन, मैथुन संज्ञा से पीड़ित ।
आगा-पीछा बिना विचारे उल्बाँधे मर्यादा-शील॥1100॥
अन्वयार्थ : इन प्राणियों का मन जिस समय स्त्रियों के संसर्ग से मूढ हो जाता है, मोही हो जाता है, मैथुन की वांछा युक्त होता है अथवा मर्यादा रहित हो जाता है, उस समय आगे पीछे की कुछ भी नहीं सोचता और सुन्दर शीलरूप कोट/गढ का उल्लंघन कर देता है ।

  सदासुखदासजी