
संसग्गीए पुरिसस्स अप्पसारस्स लद्धपसरस्स ।
अग्गिसमीवे लक्खेव मणो लहुमेव हि विलाइ॥1099॥
निर्बल चित्त और स्वच्छन्द पुरुष-मन नारी-संगति से ।
अग्नि समीप लाख या घृतवत् संग मात्र से ही पिघले॥1099॥
अन्वयार्थ : अल्प है धैर्य का बल जिसका और स्त्रियों का किया है परिचय जिसने - ऐसे पुरुष का मन स्त्रियों का संसर्ग करके अग्नि के पास रखे हुए घृत के समान नरम होकर बह जाता है ।
सदासुखदासजी