
संगो महाभयं जं विहेडिदो सावगेण संतेण ।
पुत्तेण चेव अत्थे हिदम्मि णिहिदेल्लए साहंु॥1137॥
संग महाभय है जिससे श्रावक मुनि पर सन्देह करे ।
अर्थ चुराया सुत ने पर आरोप लगाया साधु पर॥1137॥
अन्वयार्थ : क्योंकि परिग्रह महाभयकारक है । इस परिग्रह से महान धर्मात्मा के भी परिणाम बिगड जाते हैं । देखो! जमीन में गाडा हुआ धन स्वयं का पुत्र निकाल कर ले गया, तब सत्पुरुष श्रावक को भी ऐसी शंका हो गई कि मेरे द्वारा जमीन में गाडे धन को साधु ही जानता था, कदाचित् उसके परिणाम बिगड गये हों और वह धन निकाल कर ले गया हो, ऐसा विचार कर साधु को बाधा पहुँचाई । इसका संबंध ऐसा है कि कोई एक शुद्ध चारित्र के धारक मुनीश्वर एक नगर के बाहर वन था । उसमें वर्षा ऋतु में चार माह का योग धारण करके ठहरे हुए थे । उस समय उस नगर के एक श्रावक ने मुनीश्वरों की वंदना करके विचार किया कि मेरा महाभाग्य है, जो चार माह के लिये साधु का समागम हुआ । अब मैं ऐसा करूँगा, जिससे मेंरे चार माह साधु की सेवा एवं धर्मश्रवण में ही व्यतीत हों । ऐसा विचार कर वह अपने व्यसनी कपूत पुत्र के भय से अपने घर का जो सारभूत/कीमती धन, उसे एक कलश में भरकर जहाँ मुनीश्वर रहते थे, वहाँ लाकर भूमि को खोदकर उसमें गाड दिया और स्वयं निर्भय होकर साधु के समीप धर्म श्रवण करके चार माह साधु-सेवा में व्यतीत किये; परन्तु जिस समय कलश में धन भरकर अपने गृह से लाकर मुनीश्वरों के आश्रम में गाडा था । उस समय उसका व्यसनी पुत्र छिपकर देख रहा था । एक दिन पिताजी तो नगर में भोजन हेतु गये थे, उस समय वह धन का कलश जमीन में से निकाल कर ले गया । जब चातुर्मास पूरा हुआ, मुनीश्वर विहार कर गये और श्रावक भी मुनीश्वर को थोडी दूर तक पहुँुचा कर वंदना-भक्ति करके नगर में वापस आ गया, तब विचार किया कि अब धन का कलश घर में ले आऊँ । सो जिस जगह कलश गाडा था, वहाँ आकर देखा तो कलश नहीं । तब परिणामों में कुछ व्याकुल होकर विचार करता है, मेरा धन का कलश कौन ले गया? यहाँ वन में कोई भी देखनेवाला नहीं था, एक दिगंबर साधु ही थे; इसलिए अब चलो, उनसे पूछते हैं । ऐसा विचार करके जिनदत्त सेठ अपने पुत्र कुबेरदत्त को साथ लेकर मुनीश्वर के पास पहुँचा । तब मुनिश्री ने जान लिया कि "यह सेठ धन से भरे कलश के लिये आया है ।" परन्तु साधु कुछ कहें - ऐसा मार्ग नहीं है । प्राण चले जाने पर भी साधु सदोष-वचन नहीं कहते । तब श्रेष्ठी ने कहा - हे भगवन्! आप गमन कर रहे हो, परन्तु एक कथा मैं कहता हूँ, उसे श्रवण करते जाइए । तब मुनीश्वर ने कहा - क्या कथा कहते हो, सुनाइए । तब श्रेष्ठी ने एक कथा कही । उसके उत्तरस्वरूप एक कथा साधु ने कही । पुन: एक कथा सेठ ने कही और एक कथा पुन: साधुजी ने कही । इसप्रकार आठ कथा श्रेष्ठी ने और आठ कथा साधु ने कहीं । उन सोलह कथाओं के नाम मात्र आगे दो गाथाओं में वर्णन करेंगे । स्पष्ट प्रगट रूप से दोनों नहीं कह सके, श्रेष्ठी ने तो इतना तक कह दिया कि हे स्वामिन्! एक ने इतना उपकार किया और दूसरा उसका अपकार करे । तो उपकारी का अपकार करना योग्य है क्या ? तब साधु ने कहा - उपकारी का अपकार करना योग्य नहीं । परन्तु मेरी कथा सुनो । तब एक कथा साधु ने कही - उसमें ऐसा भाव था कि बिना समझे अपराध रहित को दूषण लगाना योग्य है क्या? तब श्रेष्ठी ने कहा बिना समझे दूषण लगाना तो योग्य नहीं । इसप्रकार दोनों की सोलह कथायें हो चुकीं । तब पुत्र ने पिता से कहा - हे पिताजी! इस धन के कलश को मैं ले गया हूँ, उसे तुम ग्रहण करो । इस धन के समान और कोई परिणाम बिगाडने वाला नहीं है । धिक्कार हो ऐसे धन को, जिसके कारण तुम जैसे महा श्रद्धानी व्रती श्रावकों के परिणाम चलित हो गये । आपको ऐसा विचार नहीं आया कि ऐसे धर्मात्मा दिगंबर, जिनके निकट चार माह धर्मश्रवण करके अच्छी तरह निश्चय कर लिया कि ये मेरे धन का कलश कैसे ले जायेंगे? जिन्हें इन्द्रलोक, अहमिन्द्रलोक की सम्पदा भी विष समान लगती है और अपने देह में भी ममत्व नहीं, वे पर के धन में ममता कैसे करेंगे? हे पिताजी! अब ये धन का कलश तुम ग्रहण करो, मैं तो दिगंबर दीक्षा धारण करूँगा । तब श्रेष्ठी ने भी धन के कारण अपने परिणाम और श्रद्धान का मलिनपना जानकर परिग्रह से विरक्त होकर दीक्षा धारण कर ली । परिग्रह तो क्षणमात्र में धर्म की श्रद्धा को बिगाडता है ।
सदासुखदासजी