वण्णरणउलो विज्जो वसहो तावस तहेव चूदवणं ।
रक्खसिवण्णीडुंडुह मेदज्ज मुणिस्स अक्खाणं॥1139॥
वानर नेवला वैद्य वृषभ तापस की तथा आम्र तरु की ।
साधु सर्प मणिपालक अरु मेतार्य मुनि की साधु ने॥1139॥
अन्वयार्थ : 1. दूत, 2. ब्राह्मण, 3. व्याघ्र, 4. लोक, 5. हस्ती, 6. राजपुत्र, 7. पथिक नर, 8. राजा - इन संबंधी आठ और 1. बंदर, 2. नकुल-नेवला, 3. वैद्य, 4. वृषभ, 5. तापस, 6. वृक्ष, 7. सिवणी, 8. सर्प - ये आठ, इसप्रकार सोलह कथायें परस्पर हुईं । इनका वर्णन प्रथमानुयोग के ग्रन्थों से जान लेना ।

  सदासुखदासजी