
गावइ णच्चइ धावइ कसइ ववइ लवदि तह मलेइ णरो ।
तुण्णदि विणइ याचइ कुलम्मि जादो वि गंथत्थी॥1141॥
परिग्रह हेतु कुलीन पुरुष भी गाये नाचे कृषि करे ।
बोये-बीज फसल काटे भिक्षा माँगे अरु वस्त्र सिये॥1141॥
अन्वयार्थ : परिग्रह के लिये श्रम भी बहुत किया है । परिग्रह का लोभी धनाढ्य लोगों के बाह्य आँगन में पडा रहता है । लोभी होकर दुर्भुक्त/खराब नीरस भोजन करता है । अनेकों के द्वार पर अनादर से दिया गया भोजन ग्रहण करता है । धन का लोभी होकर बहुत बोझा ढोता है । उच्च कुल में जन्मा हुआ पुरुष परिग्रह का लोभी धन के लिये अपने कुल को, जाति को, धर्म को, पद को, पूज्यपने को न गिनता हुआ नीच पुरुषों के करने योग्य महानीच कर्म करता है । वे नीचकर्म क्या-क्या हैं? उन्हें कहते हैं - गाता है, नाचता है, आगे-आगे को दौडता है, खेती करता है, बोता है, काटता है, पादमर्दनादि करता है, सिलाई-बुनाई करता है तथा याचना करता है - इत्यादि नीचकर्म लोभी बिना कौन करे?
सदासुखदासजी