पं-सदासुखदासजी
अग्गिपरिक्खित्तादो सउणो रुक्खादु उप्पडित्ताणं ।
सयमेव तं दुमं सो णीडणिमित्तं जध अदीदि॥1330॥
यथा अग्नि से घिरे वृक्ष से उड़कर पक्षी भग जाता ।
किन्तु घोंसले के कारण वह पुनः वृक्ष पर आ जाता॥1330॥
सदासुखदासजी