सयमेव वंतमसणं णिल्लज्जो णिग्घिणो सयं चेव ।
लोलो किविणो भंुजदि सुहणो जध असणतण्हाए॥1332॥
ज्यों कोई निर्लज्ज घिनौना कुत्त्ाा अपने वमन किये ।
भोजन की तृष्णावश लोलुपता से वह भोजन खाये॥1332॥

  सदासुखदासजी