एवं केई गिहवासदोसमुक्का वि दिक्खिदा संता ।
इंदियकसायदोसे हि पुणो ते चेव गिण्हंति॥1333॥
वैसे ही गृहवास दोष से मुक्त हुआ दीक्षित होवे ।
इन्द्रिय अरु कषाय दोषों को पुनः वही स्वीकार करे॥1333॥
अन्वयार्थ : जैसे व्याध/शिकारी ने मृगों को पकडने के लिये जाल बिछाया, तब कोई मृग शिकारी के भय से बहुत दूर तक भाग गया और अन्य समस्त मृगों का समूह जाल में फँस गया । तब दूर भागा हुआ मृग अपने झुंड को पाने की तृष्णा से शिकारी के जाल में स्वयं ही आ फँसता है । यद्यपि शिकारी के भय से भाग गया, तथापि अपने झुंड बिना अकेला अपने को देखकर क्लेशित होता, अपने साथियों को ढूँढता हुआ स्वयमेव अपने झुंड में शामिल होकर जाल में फँस जाता है । बाद में शिकारी द्वारा मारा जाता है । तैसे ही संसारी जीव परिग्रह त्याग कर, दीक्षित होकर इन्द्रिय और कषायों से प्रेरित पुन: आकर परिग्रह में फँस जाता है । जैसे पिंजरे से छूटा हुआ पक्षी बहुत काल तक बगीचों में घूमता हुआ भी अपने स्थान की तृष्णा से पुन: अपने आप पिंजरे में आकर फँस जाता है । वैसे ही संसारी जीव गृह-कुटुम्ब के बंधन से छूटकर दीक्षित होकर भी विषय-कषायों द्वारा प्रेरित हुआ पुुन: स्थानादि में ममत्व करके फँस जाता है तथा जैसे हाथी का बच्चा कर्दम में फंस गया हो तो उसे किसी बलवान हाथी ने अगाध कीचड में से बाहर निकाल लिया, किन्तु जल पीने की तृष्णा से स्वयं ही कीचड में जाकर फँस जाता है । तैसे ही कोई त्यागे हुए भी विषयों की तृष्णा से संसाररूप कीचड में पुन: उलझकर मरता है । तथा जैसे चारों ओर से जिसमें अग्नि लगी है, ऐसे वृक्ष से उडकर पक्षी बाहर भाग जाते हैं, परन्तु अपने घोंसले को जलता देखकर चारों ओर वृक्ष के ऊपर-ऊपर मँडराते हैं, फिर उसी वृक्ष में ही पडकर जल जाते हैं । तैसे ही इन्द्रियों के विषय एवं कषायों से प्रेरित दीक्षित होने पर भी विषयरूप अग्नि में पडकर दुर्गति को प्राप्त होता है । तथा जैसे कोई पुरुष सो रहा था, उसे सर्प लाँघकर चला गया । बाद में कोई व्यक्ति उसे जगाकर कहता है कि - "तुझे सर्प लाँघकर चला गया" तब वह उस सर्प को कौतूहल से पकडने की इच्छा करता है । तैसे ही परिग्रह को त्यागकर पुन: ग्रहण करना है । तथा जैसे स्वयं वमन किये हुए भोजन को निर्लज्ज, निर्घृण, लोलुपी, नीच श्वान ही भोजन की तृष्णा से भक्षण करता है । तैसे ही निर्लज्ज, नीच, ग्लानिरहित कोई पुरुष विषय-कषाय त्यागकर, जिनदीक्षा ग्रहण करके भी पुन: विषयों को भोगता है । इसी प्रकार कितने ही अनेक दोषों से युक्त गृहवास को छोडकर जिनदीक्षा धारण करके भी इन्द्रियों के विषय और कषायों के दोषों से पुन: उस गृहवास के दु:खों को ग्रहण करता है । कैसा है गृहवास? यह मेरा, यह मेरा - ऐसे ममत्व का आधार है, ममत्व इसमें बसता है और जीव को निरन्तर आशा तथा लोभ को उत्पन्न करने में समर्थ है । कषायों की खान है तथा इसको पीडा दूँ, इसका उपचार करूँ, ऐसे परिणाम करने में समर्थ है । पृथ्वी, जल, अग्नि, पवन और वनस्पति - इनकी हिंसा में प्रवृत्ति करानेवाला है और चेतन-अचेतन अल्प या बहुत धन ग्रहण करने में तथा बयढाने में मन-वचन-काय से परिश्रम करानेवाला है । इस गृहवास में रहकर व्यक्ति असार को सार, अनित्य को नित्य, अशरण को शरण, अशुचि को शुचि, दु:ख को सुख, अहित को हित, अनाश्रय को आश्रय तथा शत्रु को मित्र मानकर सर्व ओर दौडता है और कैसा है गृहवास? उसमें मनुष्य महादु:खी होता हुआ रहता है, जैसे लोहे के पिंजरे में सिंह रहता है । जाल में फँसा मृग रहता है; तथा कीचड में मग्न (फँसा) वृद्ध हाथी, तैसे ही अन्यायरूप कर्दम में यह मग्न हो रहा है । जैसे अनेक प्रकार के बंधनों से बँधा चोर बंदीगृह में रहता है, व्याघ्रों के बीच बलरहित हिरण रहता है तथा जाल द्वारा खेंचे हुए जलचर जीव रहते हैं । उन्हीं के समान कामरूप घने अंधकार के पटल से आच्छादित यह प्राणी रहता है । रागरूप महासर्प के जहर से उपद्रवसहित लोक वर्तते हैं, अचेत हो रहे हैं । चिंतारूपी डाकिनी ग्रसीभूत कर रही है, शोकरूप ल्याली से उपद्रव को प्राप्त हो रहा है, जिसमें क्रोधरूप अग्नि भस्म कर रही है, आशारूप लता से प्राणियों को बाँधते हैं । इष्ट स्त्री-पुरुष-मित्रादि के वियोगरूप वज्रपात से खंडित करते हैं, वांछित के अलाभरूप बाणों से बेधा जाता है और मायारूप वृद्ध स्त्री दृढ आलिंगन करती है । जहाँ तिरस्कार रूप कुहाडों से विदारते हैं, जहाँ अपयशरूप मल से लीपते हैं, जहाँ मोहरूपी वन हाथी द्वारा घाते जाते हैं, जहाँ पापरूपी शिकारी मारकर नीचे पटक देते हैं, जहाँ भयरूप लोक की शलाइयों से व्यथित करते हैं, जहाँ पश्चात्तापरूप काक दिन प्रति शब्द करते हैं अर्थात् पश्चात्ताप के कारण काक-पक्षी के समान हमेशा चिल्लाते-चीखते रहते हैं । जहाँ ईर्ष्या से विरूपता को प्राप्त होते हैं, जहाँ परिग्रहरूप पिशाच ग्रहण करता है । गृहवास में रहते हुए प्राणी असंयम के सन्मुख होते हैं । ईर्ष्यारूपी स्त्री से प्यार करते हैं, तथा अभिमानरूप राक्षस के अधिपतिपने को अनुभवते हैं, विस्तीर्ण उज्ज्वल चारित्ररूप छत्र के सुख प्राप्त नहीं होते, मरणरूप विषवृक्ष को दग्ध नहीं करते हैं, मोहरूप दृढ साँकल को नहीं तोडते हैं तथा अनेक विचित्र योनियों में परिभ्रमण को नहीं रोकते हैं । इसप्रकार गृहवास के दोषों का त्याग करके और संयम ग्रहण करके भी जो अधम पुरुष विषय-कषायों के वशीभूत होकर पुन: परिग्रहादि को अंगीकार करते हैं, वे पूर्व में कहे गये अनर्थ को अंगीकार करते हैं ।

  सदासुखदासजी