
जागरणत्थं इच्चेवमादिकं कुण कमं सदा उत्तो ।
झाणेण विणा बज्झो कालो हु तुमे ण कायव्वो॥1452॥
निद्रा दूर भगाने हेतू इस चिन्तन में सदा रहो ।
इक पल भी तुम नहीं गँवाओ बिना ध्यान के भव्य अहो॥1452॥
अन्वयार्थ : मनुष्यों को प्रीति, भय और शोक होने पर निद्रा नहीं आती है । इसलिए जागृत रहने के लिये प्रीति, भय और शोक - इन तीनों को अंगीकार करो । यहाँ निद्रा-विजयी होने के लिये पंच परावर्तन रूप संसार के अनन्त जन्म-मरणों से भय करो/भयभीत रहो और उत्तमार्थ/रत्नत्रय में प्रीति करो । पूर्व में जो खराब - खोटे आचरण किये, उनमें शोक करो । कैसे करना? वही कहते हैं - नरकादि गतियों में बारम्बार परिभ्रमण करते हुए मैंने शरीर संबंधी/ शारीरिक, आगंतुक, मानसिक तथा क्षेत्र-कालादि से उत्पन्न अनेक प्रकार के दु:ख भोगे, वे ही दु:ख भविष्य में भोगने में आयेंगे । इस प्रकार संसार से भय करना । समस्त आपदाओं के समूह को नाश करने हेतु तथा स्वर्ग-मुक्तिके सुखों की प्राप्ति के लिये, इस असार शरीर का भार उतारने तथा अनन्तज्ञान, अनन्तदर्शन, अनन्तवीर्य और अनन्तसुख रूप लक्ष्मी का साम्राज्य प्राप्त करने हेतु कर्मरूपी विषवृक्ष को उखाडने में समर्थ और पूर्व में अनन्तभवों में नहीं पाई - ऐसी रत्नत्रय आराधना करने के लिये मैं उद्यमी हुआ हूँ, ऐसे रत्नत्रय में प्रीति करना ।
सदासुखदासजी