संसाराडविणित्थरणमिच्छदो अणपणीय दोसाहिं ।
सोदुं ण खमो अहिमणपणीय सोंदु व सघरम्मि॥1453॥
घर में बैठा सर्प निकाले बिना नहीं सम्भव सोना ।
भव-अटवी से नहीं निकल सकते हैं दोष अभाव बिना॥1453॥
अन्वयार्थ : जैसे जिसके गृह में सर्प हो तो सर्प को घर में से निकाले बिना सोने को तैयार नहीं होता । तैसे ही संसाररूपी वन से पार होने का इच्छुक पुरुष दोषों को दूर किये बिना निद्रा लेने को तैयार नहीं होता ।

  सदासुखदासजी