
अब्भंतर बाहिरगे तवम्मि सत्तिं सगं अगूहंतो ।
उज्जमसु सुहे देहे अप्पडिबद्धो अणलसो तं॥1459॥
निज शक्ति को बिना छिपाये तप द्वय में उद्योग करो ।
इन्द्रिय-सुख या तन में नहिं प्रतिबद्ध रहो आलस त्यागो॥1459॥
अन्वयार्थ : भो भव्य! ऐसा जानकर अब तुम शरीर के सुख में आसक्ति का त्याग करो और आलस रहित होकर बाह्य-अभ्यंतर बारह प्रकार के तपों में अपनी शक्ति को छिपाये बिना उद्यमशील रहो ।
सदासुखदासजी