पं-सदासुखदासजी
तस्स ण भावो सुद्धो तेण पउत्ता तदो हवदि माया ।
ण य होइ धम्मसड्ढा तिव्वा सुहदेहपिक्खाए॥1461॥
उसके नहिं परिणाम शुद्ध तपहीन और मायाचारी ।
सुख-शरीर में आसक्ति है उसे धर्म श्रद्धान नहीं॥1461॥
सदासुखदासजी