अप्पा य वंचिओ तेण होइ विरियं च गूहियं भवदि ।
सुहसीलदाए जीवो बंधदि हु असादवेदणियं॥1462॥
शक्ति तथापि करे नहिं तप जो वह अपने को ठगता है ।
सुखासक्ति से भव दुःखदायी कर्म असाता बँधता है॥1462॥
अन्वयार्थ : जो पुरुष अपने में शक्ति होने पर भी सुख में आसक्तपने से, आलसीपने के कारण तथा देह में आसक्ति से अपनी शक्तिप्रमाण तप नहीं करते हैं, उन पुरुषों के भाव शुद्धि नहीं है - शक्तिप्रमाण तप नहीं करने में भावों की शुद्धता कहाँ रही? तथा भावों की शुद्धता बिना मायाचार में ही प्रवर्तन किया! और देह में सुखिया बुद्धि के कारण उसके धर्म में तीव्र-दृढ श्रद्धान भी नहीं होता । जिसके विनाशीक देह में प्रीति वर्तती है, उसने देह को ही आपा जाना है, उसके कहाँ का धर्म? केवल मायाचार है । जो देह के सुख में आसक्त है, वह व्यक्ति अपने आत्मा को ठगता है! उसने अपना वीर्य-पराक्रम-शक्ति छिपाई, देह के सुख में आसक्ति से असातावेदनीय कर्म का बंध किया । इस तरह जो देह के सुख में आसक्त होकर तप नहीं करता है, उसके दोष दिखाये ।

  सदासुखदासजी