तह मुज्झंतो खवगो सारेदव्वो य तो तवो गणिणा ।
जह सो विसुद्धलेस्सो पच्चागदवेदणो होज्ज॥1513॥
इसप्रकार जब क्षपक मूढ़ हो पिछली बात कहें आचार्य ।
जिससे परिणति हो विशुद्ध अरु पुनः प्रकट हो ज्ञान यथार्थ॥1513॥
अन्वयार्थ : ऐसे पूर्वोक्त प्रासुक द्रव्यों से प्रतीकार करने पर भी क्षपक के तीव्र पापकर्म के उदय से वेदना का उपशम न हो - वेदना नहीं घटे, क्योंकि पापकर्म का प्रबल उदय होता है, तब समस्त प्रतीकार/उपाय निष्फल हो जाते हैं अथवा क्षुधा-तृषा के परीषह से क्षपक तिरस्कृत आकुलित हो जाता है अथवा अनेक रोग क्षुधा-तृषा, शीत-उष्णादि उपसर्ग से क्षपक अभिभूत होकर मूर्च्छित हो जाता है । वेदना से पीडित होकर व्याकुलित हो जाता है अथवा परीषह, उपसर्गादि से क्षपक अपने वश में नहीं रह पाता है, रोग के वशीभूत होकर विलाप करने लग जाता है, प्रलाप करने लग जाता है अथवा अयोग्य वचन कहने लगें या गुणश्रेणी से उतरने की बुद्धि करने लगें, चारित्र को छोडने की भावना करने लग जायें और क्षपक होने पर भी रात्रिभोजन चाहने लग जायें तथा द्वितीय भोजन जलपान की याचना करने लगें, प्रथम भोजन की याचना करने लग जायें अथवा मोहरूप विषम स्थिति होने पर स्खलितपद होकर मुनिव्रत को भंग करने की इच्छा करने लगें, तब करुणानिधान निर्यापकाचार्य अपने धैर्य को किंचित् भी नहीं छोडते हुए क्षपक की सारणा करते हैं अर्थात् क्षपक के व्रतों की इस प्रकार रक्षा करते हैं, जिससे क्षपक उज्ज्वल - शुद्ध लेश्या को प्राप्त हो तथा चेतना लौट आवे, अपने व्रतों का स्मरण जिस तरह करें, उस तरह आचार्य प्रयत्न करते हैं । पुन: मुनिधर्म में सावधान हो जायें ऐसी सारणा करते हैं ।

  सदासुखदासजी