
एवं आउच्छित्ता परिक्खहेदंु गणी तयं खवयं ।
सारड वच्छलयाए तस्स य कवयं करिस्संति॥1515॥
इसप्रकार आचार्य क्षपक की चेतनता का ज्ञान करें ।
यदि सचेत हो तो उसके संयम की रक्षा की जाये॥1515॥
अन्वयार्थ : हे आत्मकल्याण के अर्थी! तुम कौन हो? तुम्हारा नाम क्या है? तुम कहाँ बसते हो? अभी कौन काल वर्त/चल रहा है? तुम कहाँ - क्या करते हो? तुम किस प्रकार रहते हो? हमारा नाम क्या है? इस प्रकार आचार्य उनकी सावधानी की परीक्षा हेतु क्षपक को बारम्बार पूछकर उनकी रक्षा करते हैं । कितने ही क्षपक इस प्रकार पूछने से ही सचेत हो जाते हैं - अहो! मैंने मुनि का व्रत धारणकर संन्यास लिया है । ये आचार्य मेरा परमोपकार करने वाले गुरु हैं, मैं कैसे अचेत होकर अयोग्य आचरण करता हूँ । मुझे अब सावधान होकर रत्नत्रय की उपासना पूर्वक मरण करना उचित है । आचार्य द्वारा पूछते ही इसप्रकार सावधान हो जाते हैं । अथवा इनमें चेतना है या अचेत हैं? ऐसा निश्चय करके और क्षपक में वात्सल्यभाव रखते हुए, आचार्य भगवान विचारते हैं कि यदि सचेत हैं तो अब इनके आराधना की रक्षा करने वाला कवच धारण कराऊँगा ।
सदासुखदासजी