जो पुण एवं ण करिज्ज सारणं तस्सं वियलचक्खुस्स ।
सो तेण होइ णिद्धंधसेण खवओ परिचत्तो॥1516॥
यदि उस चंचल चित्त क्षपक को स्मरण करायें नहिं आचार्य ।
तो जानो उस निर्दय निर्यापक ने किया क्षपक का त्याग॥1516॥
अन्वयार्थ : इस प्रकार चलायमान है चित्त की प्रवृत्ति जिसकी ऐसे क्षपक का यदि आचार्य गुरु रक्षण नहीं करते तो उस निर्दयी गुरु ने क्षपक का त्याग किया, छोड दिया । यह तो बडा अनर्थ हुआ ।

  सदासुखदासजी