पं-सदासुखदासजी
पगलंतरुधिरधारो पलंबचम्मो पभिन्नपोट्टसिरो ।
पउलिदद्दिदओ जं फुडिदत्थो पडिचूरियंगो य॥1588॥
बहे रुधिर की धार लटकती चमड़ी सिर अरु पेट फटा ।
हृदय दुःखी अरु आँखें फूटीं सारा तन छेदा-भेदा॥1588॥
सदासुखदासजी