जं चडयंडतकरचरणंगो पत्तो सि वेदणं तिव्वं ।
णिरए अणंतखुत्तो तं अणुचिंतेहिं णिस्सेसं॥1589॥
हाथ पैर भी काँपे - एेसे दुःख भोगे तुमने चिरकाल ।
नरकों में जाकर क्रम से सब करो चिन्तवन बारम्बार॥1589॥
अन्वयार्थ : हे मुने! नरकों में छीले गये हैं सारे आंगोपांग जिसके ऐसे तुम, अन्य नारकियों द्वारा खारे जल से सींचकर पवन से कंपायमान किये गये हो, तीक्ष्ण शक्ति नामक आयुधों द्वारा दयारहित होकर खेंचे गये हो, पलटे गये हो । झर रही है रुधिर की धारा जिसके और लटक रही खाल और विदारा गया है उदर-मस्तक जिसका और तप्तायमान है हृदय जिसका, फूट गई हैं आँखें जिसकी और चूर्ण-चूर्ण किया है अंग जिसका और काँपते हैं हस्त-पाद जिसके, ऐसे तुमने नरक में ऐसी तीव्र वेदना को अनंत बार भोगा है । नरक के उन सभी दु:खों का चिंतवन करो ।

  सदासुखदासजी