कण्णोठ्ठसीसणासाछेदणदंताण भंजणं चेव ।
उप्पाडणं च अच्छीण तहा जिब्भायणीहरणं॥1604॥
कान नाक या होंठ काटना और दाँत को तोड़ दिया ।
जीभ खींच ली आँख निकाली ये सब दुःख तुमने भोगा॥1604॥

  सदासुखदासजी