
जं दुक्खं संपत्तो अणंतखुत्तो मणे सरीरे य ।
माणुसभवे वि तं सव्वमेव चिंतेहि तं धीर॥1606॥
इत्यादिक दुःख नर भव पाकर तुमने भोगे बारम्बार ।
दैहिक दैविक और मानसिक धीर क्षपक सब करो विचार॥1606॥
अन्वयार्थ : हे मुने! मनुष्यभव में इस जीव ने जो-जो दु:ख भोगे हैं, उन्हें याद करो । दंड बेद , लाठियों से मारे गये हो, घोडों को मारने के कसा/चाबुकों की मार भोगी, सहन की है । लुहारों के घनों से चूरे गये हो, ठोकरों के प्रहार और मुष्टियों के प्रहार भोगे, सहे हैं । काँटों से युक्त भूमि में मर्दले गये हो, घोर/भयानक जैसे हों, वैसे कढाहों में पकाये गये हो, मस्तक ऊपर अग्नि जलाई गई है, दमन किया गया है, निर्बल किये गये हो, साँकलों द्वारा हाथ-पैर को बाँधने की वेदना भी भोगी है, रज्जू/रस्सियों में अंडक/अंटी बाँधकर मारे गये हो तथा रस्सियों से पूरे शरीर, सर्व अंगों को बाँधकर तुम्हें मारा गया है । तथा आक्रोडन/दोनों हाथों को पीठ पर ले जाकर बाँधे, ग्रीवा/गर्दन में फाँसी लगाकर वृक्षों की शाखाओं में झुलाना या लटकाना, एक पैर को वृक्ष की शाखा से बाँधकर नीचे मस्तक करके लटकाना, भोजन-पान के अभाव से मारे गये हो, गड्ढा खोदकर उसमें गाडकर ऊपर से पूरा गड्ढा धूल से भर देने से, पराधीन पडे रहने से घोर दु:ख भोगे हैं । मनुष्य भव में कर्ण को काटना, ओष्ठों का छेदना, मस्तक विदारण करना, नासिका छेदना, दाँतों का भंजन/तोड देना, नेत्रों का उखाडना, जिह्वा निकाल देना इत्यादि दु:ख पराधीन होकर अनेक बार भोगे हैं । अग्नि में जलकर मरे हो, विष भक्षण करके मरे हो, शत्रुओं द्वारा अनेक प्रकार के घातों से मारे गये हो, सर्प द्वारा डसे गये हो, सिंह-व्याघ्रादि द्वारा विदारे गये हो, शत्रुओं के घातों से घाते गये हो । तथा शीत, उष्ण, डांस, मच्छरों की वेदना से, क्षुधा-तृषादि की वेदना से मारे गये हो और भी कुएँ में पडना, पर्वत से गिरना, वृक्ष के पडने से, जगह-मकान के पडने से दब जाने से मरना, वर्षा की बाधा से, पवन की बाधा से, गडों/ओलों की मार से, बिजली के पडने से, तीव्र रोगादि के घोर दु:ख पा-पाकर अनेक बार मरे हो । मनुष्य भव में शरीरसंबंधी दु:ख, दारिद्रताकृत, अपमानजनित, इष्टवियोगादि जनित मानसिक दु:ख, समस्त दु:खों को तुमने अनन्तबार भोगा है, उनका हे धीर! चिन्तवन करो । यहाँ संन्यास के अवसर में उत्पन्न हुई किंचित् वेदना का क्या दु:ख है? अभी तो समभावों से सहन कर सर्व दु:खों का अभाव करने का अवसर है, इसलिए कायरता तजो, परम धैर्य धारण करके परीषहों को जीतकर सम्पूर्ण कल्याण को प्राप्त होओ । यह कर्म पर विजय प्राप्त करने का समय है, इस अवसर में गाफिल होना उचित नहीं है ।
सदासुखदासजी