रायादिकुडुंबीणं अदयाए असंजमं करंताणं ।
धण्णंतरी वि कादुं ण समत्थो वेदणोवसमं॥1620॥
रायोदकुडुंबीणं अदयाए असंजमं करंताणं ।
धण्णंतरी ेव कादुं ण समत्थाि वदिणाविसमं॥1620॥
अन्वयार्थ : जिनको दया नहीं ऐसे अदया से असंयम रूप प्रवर्तने वाले राजादि, कुटुम्बी जनों की वेदना को शान्त करने के लिये वैद्यों का शिरोमणि धन्वंतरि वैद्य भी समर्थ नहीं है तो फिर सर्व जीवों की दया पालने वाले, तुम्हारा प्रतीकार करने वाले साधुजन के द्वारा याचना से प्राप्त हुए प्रासुक द्रव्यों या औषधियों द्वारा संस्तरगत साधु की वेदना का उपशमन कर सकते हैं क्या? नहीं कर सकते हैं ।

  सदासुखदासजी