पुरिसस्स पावकम्मोदएण ण करंति वेदणोवसमं ।
सुट्ठु पउत्ताणि वि ओसधाणि अदिवीरियाणी वि॥1619॥
पापकर्म का उदय होय जब कर न सकें वेदना शमन ।
चाहें कितना सँभल-सँभल कर बलशाली औषधि ले नर॥1619॥
अन्वयार्थ : बहुत बल-वीर्य युक्त औषधियों का बडे यत्न एवं विधि से प्रयोग करने पर भी पापकर्म के उदय होने पर वे औषधियाँ जीव की वेदना को शान्त नहीं करती हैं ।

  सदासुखदासजी