मोक्खाभिलासिणो संजदस्स णिधणगमणं पि होदि वरं ।
ण य वेदणाणिमित्तं अप्पासुगसेवणं कादंु॥1622॥
शिवसुख अभिलाषी संयत का मरण प्राप्त भी श्रेष्ठ कहा ।
किन्तु वेदना शान्ति हेतु अप्रासुक ग्रहण अश्रेष्ठ कहा॥1622॥

  सदासुखदासजी