णिधणगमो एयभवे णासो ण पुणो पुरिल्लजम्मेसु ।
णाणं असंजमो पुण कुणइ भवसएसु बहुगेेसु॥1623॥
मरण प्राप्त इस भव का नाशक पुनर्जन्म नहिं नष्ट करे ।
किन्तु असंयम तो शत-शत जन्मों का नाशक कहा अरे॥1623॥
अन्वयार्थ : हे मुने! मोक्ष के अभिलाषी संयमीजनों का मरण हो जाना तो श्रेष्ठ है, लेकिन वेदना को शान्त करने के लिए अयोग्य द्रव्य/अप्रासुक औषधियों का सेवन करना श्रेष्ठ नहीं; क्योंकि (संयम की रक्षा करते हुए अशुद्ध औषधि का सेवन नहीं किया और उससे) मरण हो गया तो वह एक इसी पर्याय का मरण है, आगामी जन्मों में तो नाश नहीं है, किन्तु असंयम तो अनेक सैकडों भवों में नाश करने वाला है । इसलिए एक जन्म/इस भव में थोडे दिन जीने के लिए संयम का नाश करना उचित नहीं ।

  सदासुखदासजी