
आहारत्थं काऊण पावककम्माणि तं परिगओ सि ।
संसारमणादीयं दुक्खसहस्साणि पावंतो॥1660॥
आहारत्थं काऊण िावककम्मोण तं पिरगआि ेस ।
संसारमणादीयं दुक्खसहस्सोण िावंताि॥1660॥
अन्वयार्थ : हे मुने! तुमने पूर्व जन्मों में आहार के लिए ही पापकर्म करके हजारों दु:खों को पाते हुए अनादि संसार में परिभ्रमण किया, अनादि से निगोद आदि के दु:खों को भोगते हुए अनन्त काल व्यतीत किया । अब फिर भी अनन्त संसार में भ्रमने की इच्छा करते हो क्या? ऐसा साधुपना पाकर, जिनेन्द्र भगवान के परमागम का उपदेश पाकर, व्रत धारण करके, संन्यास ग्रहण करके भी आहार की लालसा नष्ट नहीं हुई तो अनन्तानन्त काल पर्यंत संसार में क्षुधा, तृषा, रोग, जन्म, मरण वियोगादि के दु:ख ही भोगोगे - ऐसा जानना ।
सदासुखदासजी