चक्कधरो वि सुभूमो फलरसगिद्धीए बंचिओ संतो ।
णठ्ठो समुद्दमज्झे सपरिजणो तो गओ णिरयं॥1659॥
सुर प्रदत्त फल की लम्पटता से सुभौम चक्री नृप भी ।
सपरिवार सागर में डूबा मरकर गया नरक में भी॥1659॥
अन्वयार्थ : सुभौम नाम का चक्रवर्ती छहखंड-भरतक्षेत्र का स्वामी भी किसी एक विदेशी का भेष धरकर आये वैरी देव द्वारा लाया हुआ एक फल खाकर, उसके रस की लम्पटता से ठगाया गया । परिवार के व्यक्तियों सहित समुद्र में डूबकर सप्तम नरक को प्राप्त हुआ । तो औरों की क्या कहना?

  सदासुखदासजी