
जीवस्स णत्थि तित्ती चिरंपि भुंजंतयस्स आहारं ।
तित्तीए विणा चित्तं उव्वूरं उद्धुदं होय॥1662॥
जीव न तृप्त कभी होता है भोजन करके भी चिरकाल ।
और तृप्ति के बिना निरन्तर चित्त रहे अति ही व्याकुल॥1662॥
अन्वयार्थ : हे मुने! यदि तुम यह विचारो कि "मैं आहार करके तृष्णा के मिट जाने से तृप्त हो जाऊँगा" सो आहार से जीव की कदापि तृप्ति नहीं होती । यह क्षुधावेदना तो वेदनीयकर्म की शक्ति के नाश होने पर ही मिटेगी । अति दीर्घकाल से आहार का भक्षण करने पर भी जीव को तृप्ति नहीं हुई और तृप्ति बिना चित्त अत्यन्त चलायमान रहता है ।
सदासुखदासजी