जह इंधणेहिं अग्गी जह य समुद्दो णदीसहस्सेहिं ।
आहारेण ण सक्को तह तिप्पेदुं इमो जीवो॥1663॥
यथा अग्नि की ईंधन से अरु सहस्र नदी से सागर की ।
तृप्ति न होती वैसे ही भोजन से तृप्ति न हो नर की॥1663॥
अन्वयार्थ : जैसे अग्नि ईंधन से तृप्त नहीं होती, समुद्र हजारों नदियों से तृप्त नहीं होता । तैसे ही इस जीव को आहार करके तृप्ति पाना शक्य नहीं है, उलटी लालसा बढती ही जाती है ।

  सदासुखदासजी