
ण परीसहेहिं संताविउं वि सो झाइ अट्टरुद्दाणि ।
सुठ्ठुवहाणे सुद्घंपि अट्टरुद्दा वि णासंति॥1709॥
परिषह पीड़ित होने पर भी आर्त-रौद्र नहिं ध्यान करे ।
भली भाँति भाये जो निर्मल भाव उन्हें ये नष्ट करें॥1709॥
अन्वयार्थ : अनेक प्रकार के क्षुधा, तृषा, रोगादि परीषहों की बाधा को प्राप्त हुआ क्षपक आर्त-रौद्र दोनों अशुभ ध्यानों को नहीं ध्याता; क्योंकि आर्त-रौद्र - ये दोनों अशुभ ध्यानों का सम्यक् उपयोग से प्राप्त शुद्ध क्षपक का भी नाश करता है । इसलिए प्राणों को हरने वाले उपसर्ग-परीषहों कृत संताप आने पर भी क्षपक आर्त-रौद्र दुर्ध्यानों को प्राप्त नहीं होता ।
सदासुखदासजी