
धम्मं चदुप्पयारं सुक्कं च चदुव्विधं किलेसहरं ।
संसार दुक्खभीरो दुण्णि वि ज्झाणाणि सो ज्झदि॥1708॥
धर्म-शुक्ल के चार-चार हैं भेद कष्ट हरनेवाले ।
भवदुःख से भयभीत मुनीश्वर धर्म शुक्ल द्वय ध्यान धरें॥1708॥
अन्वयार्थ : जो क्षपक संसार के दु:खों से भयभीत है, वह क्लेश का नाश करने वाले चार प्रकार के धर्मध्यान और चार प्रकार के शुक्लध्यान - ऐसे दो प्रकार के ध्यानों को ध्याता है ।
सदासुखदासजी