
अमणुण्संपओगे इठ्ठविओए परिस्सहणिदाणे ।
अठ्ठं कसायसहियं झाणं भणियं समासेण॥1711॥
इष्ट-वियोग अनिष्ट-संयोग परिषह और निदान कहे ।
इसप्रकार सकषाय ध्यान यह आर्तध्यान संक्षेप कहे॥1711॥
अन्वयार्थ : संस्तर को प्राप्त हुआ जो क्षपक वह चार प्रकार के आर्तध्यान को तथा चार प्रकार के रौद्र ध्यान को और उनके समस्त भेदों को जानता है । जाने बिना अनादिकाल से दोनों दुर्ध्यान आत्मगुणों के घातक हैं, इनसे कैसे छूटा जाये? इनमें से आर्तध्यान के भेदों को ऐसा जानना - 1) अमनोज्ञ वस्तु के संयोग से उत्पन्न हुआ जो संक्लेश परिणाम, वह अनिष्टसंयोगज नामक का आर्तध्यान का भेद है । 2) इष्टवस्तु के वियोग से उत्पन्न हुआ जो संक्लेश, वह इष्टवियोगज नाम का आर्तध्यान का भेद है । 3) क्षुधा, तृषा, रोगादि की वेदना से उत्पन्न हुआ जो संक्लेश, वह वेदनाजनित/पीडाचिन्तवन नाम का आर्तध्यान का भेद है । 4) भोगों की अभिलाषा से उत्पन्न हुआ जो संक्लेश, वह निदान नाम का आर्तध्यान का भेद है । यह कषायसहित आर्तध्यान का संक्षेप में वर्णन किया । यहाँ ऐसा जानना कि दु:ख, उससे उत्पन्न हुआ ध्यान, उसे आर्तध्यान कहते हैं । अब अनिष्टसंयोगज नाम के आर्तध्यान को कुछ विशेष कहते हैं - जो अपने स्वजन, धन, शरीर का नाश करने वाले अग्नि, जल, पवन, विष, शस्त्र, सर्प, हस्ती, सिंह, व्याघ्र, दुष्ट राक्षस तथा स्थल में रहने वाले क्रूर महिषादि जीव, जल के दुष्ट मत्स्यादि जीव, बिल के मूषादि जीव, दुष्ट राजा, वैरी, भील, चोर, लुटेरे तथा दुष्ट स्त्री, कपूत पुत्र, दुष्ट बांधवादि - इनके संयोग से तथा निकटता होने से उत्पन्न जो मन में संक्लेश, वह अनिष्टसंयोगज नाम का प्रथम आर्तध्यान है । अनिष्ट का संयोग होता है, तब परिणामों में बहुत संक्लेश - दु:ख होता है, तब यही चिंतवन चलता रहता है कि "मुझसे इनका वियोग कैसे हो? कब होगा? क्या करूँ? किससे कहूँ? कहाँ जाऊँ? इस प्रकार के विकल्प पापबंध के कारण हैं, इसे अनिष्ट संयोगज आर्तध्यान कहा है । जब सम्यग्दृष्टि को अनिष्ट का संयोग होता है, तब ऐसा चिंतवन करते हैं कि हे आत्मन्! पदार्थ के सत्यार्थ स्वरूप का चिंतवन करो, इस जगत में कोई भी वस्तु अनिष्ट नहीं है । स्वयं किया हुआ कर्म ही एक अनिष्ट है, वह पापकर्म उदय में आकर अनिष्ट संयोगरूप रस देता है, नरकों में असंख्यात कालपर्यंत अनिष्ट का ही संयोग रहा है, तिर्यंचगति में परस्पर कलह, मारण, वध-बंधन, बोझ लादना, अंग-छेदनादि रूप अनिष्टसंयोग अनंत कालपर्यंत भोगे तथा विकलत्रयों की बाधा भोगी, अब तुम्हें कुछ नवीन अनिष्ट प्राप्त हुआ है क्या? अत: अब परम समताभाव को अंगीकार करो । जो संसार में वास करेगा, उसको तो अनिष्ट सामग्री मिलती ही रहेगी । इसलिए अन्य पदार्थ में द्वेषबुद्धि छोडकर एक दुष्ट कर्म के नाश का परम उद्यम करो । तुम्हारे पुण्य का उदय होता तो ये स्त्री-पुत्र-बांधवादि दुष्ट कैसे होते? अत: संसार में सभी पुण्य-पाप की रचना है । पाप का उदय आता है, तब अपने इष्ट मित्र, प्यारी स्त्री, सपूत पुत्र, हितकारी बांधव - ये सभी वैरी बनकर महादु:ख देकर मारते हैं । इसलिए जगत में कोई अनिष्ट-इष्ट नहीं है । ये दुष्ट कर्म वैरी हैं, इनको अनिष्ट जानना । वृथा ही परपदार्थ में अनिष्ट का संकल्प करके वैर बाँधकर दुर्गति के कारणभूत अशुभकर्म का बंध मत करो । और अपने प्यारे पुत्र, स्त्री, मित्र, बांधव का, चित्त में प्रीति करने वाले राज्य का, ऐश्वर्य, भोग, उपभोग का, नगर, ग्राम, महल, मकान, धन, वस्त्र, परिग्रह का वियोग होने पर जो शोक, क्लेश, भ्रम, भय उत्पन्न होता है, यह इष्टवियोगज आर्तध्यान है । हाय! अब मेरा इष्ट कैसे प्राप्त होगा? कहाँ देखूँ? किससे कहूँ? कहाँ जाऊँ? कैसे जीऊँ? मेरा कौन आधार है? किसकी शरण लूँ? महा दु:सह दु:ख कैसे भोगूँ? इत्यादि संक्लेश इष्ट के वियोग से होता है । बडे-बडे ज्ञानवान शूरवीर धैर्य के धारकों का हृदय इष्टवियोग से फट जाता है, धैर्य छूट जाता है । ऐसे इष्टवियोगज आर्तध्यान को एक सम्यग्ज्ञानी ही जीतते हैं । सम्यग्ज्ञानी इष्ट का वियोग होने पर ऐसा चिंतवन करते हैं कि इस जगत में कोई वस्तु इष्ट-अनिष्ट नहीं है । अपने ही रागभाव से इष्ट मानता है, द्वेषभाव से अनिष्ट मानता है । पुण्य का उदय हो, तब सभी इष्ट रूप परिणमते हैं और पाप का उदय हो, तब अनिष्ट रूप परिणमते हैं । संसार में जितने इष्टों का संबंध हुआ है, उनका वियोग अवश्य होगा । इसलिए अब इष्ट के वियोग में शोक करना पापबंध का कारण है और समस्त चेतन-अचेतन वस्तु से मेरा अनेक बार संयोग हो-होकर वियोग हुआ है । अनेक बार मित्र शत्रु हो गये है, शत्रु मित्र हो गये हैं । कोई मेरा अनादि का शत्रु-मित्र नहीं है, सभी अपने-अपने मतलब के विषय-कषाय के निमित्त शत्रु-मित्रपना करते हैं । सभी वस्तुएँ पर्यायार्थिकनय से विनाशीक हैं, मुझ अज्ञानी ने वृथा ही परद्रव्यों में मोह से ममता कर रखी है । जब मेरी दीर्घ-लम्बी आयु है, तब तो अनुक्रम से वियोग होगा ही । आज माता का, आज पिता का, आज स्त्री का, आज पुत्र का, आज मित्र का, आज बांधव का - इस तरह सभी का अपनी-अपनी आयु के अनुसार निश्चय से वियोग होगा और मेरी अल्प आयु है तो सभी का एकसाथ ही वियोग होगा । जब मेरा मरण होगा, तब सभी का वियोग एक क्षण में ही हो जायेगा । इसलिए परवस्तुओं में ममताभाव करके संसार में परिभ्रमण करने का कारणभूत कर्मबंध, उससे प्राप्त दु:ख को अंगीकार करना उचित नहीं है । मैं अनादि का अकेला ही हूँ, अकेला ही आया हूँ । अकेला ही जाऊँगा, अत: इष्ट वस्तु के वियोग में पश्चात्ताप करने समान अन्य कोई मूर्खता नहीं है । कास, श्वास, ज्वर, उदर, भगंदर, उदरशूल, शिर:शूल, नेत्रशूल, अतिसार/दस्त, कुष्ठ रोग, वात, पित्त, कफ इत्यादि प्रतिक्षण वृद्धि को प्राप्त हुए जो रोग, उससे परिणामों में व्याकुलता उत्पन्न होना रोगार्त्त नामक आर्तध्यान है । मेरा यह रोग कैसे मिटे? क्या करूँ? किससे इलाज कराऊँ? कौन वैद्य मेरा दु:ख मिटायेगा, कौन देवता मेरी सहायता करेगा । या मंत्र-तंत्र, औषधि, मणि, मुद्रा, मंडलादि से मेरा दु:ख हरने वाला कोई पैदा हो जाये, इसप्रकार निरंतर संक्लेशरूप परिणामों का होना, वह वेदनाजनित आर्तध्यान दुर्गति का कारण है । सम्यग्दृष्टि रोगादि का इसप्रकार चिंतवन करते हैं कि मुझे तो सबसे बडा रोग ज्ञानावरणादि कर्म का है । इनने मेरे स्वरूप को पराधीन कर रखा है और संसार में अनंतानंत काल से जन्मम रणादि करा रहे हैं । यह शरीर ही रोग है, इसमें शाश्वती क्षुधावेदना, तृषावेदना, शीतवेदना, उष्णवेदना, निरंतर उत्पन्न होती है । कैसा है शरीर? सप्त धातु और सप्त उपधातु का पिंड है, यह महादुर्गंधमय अनेक रोगों से भरा है । ऐसे देह में बसकर निरोगपना चाहना बडी मूर्खता है । और एक रोग मिटा तो दूसरा हो जाता है, मेरा पूर्वकर्मजनित उदय है, कायर होकर भोगूँगा तो भी रोग नहीं मिटेगा और धैर्य धारण करूँगा तो भी नहीं छूटेगा, कर्म के उदय को मेटने में कौन समर्थ है? जगत के देव, दानव, इन्द्र, धरणेन्द्र, जिनेन्द्र भी कर्म उदय को टालने में समर्थ नहीं हैं । कर्म हरने को और कर्म देने को जगत में कोई समर्थ नहीं है; इसलिए रोग में आकुलित होकर अशुभ तिर्यंचगति का कारणभूत कर्म का दृढ बंधन करना उचित नहीं । जैसा ज्ञानी भगवान ने मेरा होना देखा है, वैसा ही होगा । यह रोग तो देह में है, देह का ही घात करेगा । मेरे स्वरूप अविनाशी ज्ञानदश र्नमय आत्मा का नाश करने में कोई समर्थ नहीं, अत: रोग में आर्तध्यान करना तिर्यंचगति का कारण है । भोगों के लिए देवपना, इन्द्रपना, राजापना और श्रेष्ठीपना चाहना, वह निदान नाम का आर्तध्यान है । अपनी भोगसामग्री की वांछा करना, रूप की वांछा करना, ऐश्वर्य चाहना, जगत में अति प्रसिद्ध कीर्ति चाहना, जिनेन्द्र-चक्रवर्ती-नारायण पद को चाहना, शत्रुओं से रहित राज्य चाहना, रूपवती स्त्री चाहना, अपना सत्कार-पूजा चाहना, शत्रुओं का - दुष्टों का नाश चाहना, शत्रुओं के घात के लिये बल-वीर्यादि की वांछा करना तथा दीर्घ-काल तक जीने की इच्छा करना, वह निदान नाम का आर्तध्यान है । सम्यग्ज्ञानी परवस्तु की वांछा नहीं करते, भोगों के सुख तो सुखाभास हैं, अज्ञानी जीवों को सुख भासता है । ये भोग और राज्य तो कर्माधीन हैं । पुण्योदय हो तो प्राप्त होते हैं, पूर्वभवकृत पुण्य का उदय न हो तो करोडों कष्ट करने पर भी लेशमात्र भी प्राप्त नहीं होते । ये भोग प्राप्त होते ही अतितृष्णा/आकुलता के बढाने वाले हैं, विनाशीक हैं, अंतरंग में चाह की अति दाह उत्पन्न होती है, तब इनको ग्रहण करता है । ये भोग असातावेदनीय जनित दु:खों का किंचित्मात्र समय के लिये उपशमन करने का इलाज है । जिसे गर्मी लगती है, उसे शीत पवन अच्छी लगती है । जिसे क्षुधावेदना पीडा करती है, उसे भोजन सुखकारी लगता है । जिसे तृषावेदना पीडा करती है, उसे शीतल जल में सुख भासता है । जिसे शीतवेदना-कामवेदना पीडा करती है, उसे अग्नि का तापना, रुई के वस्त्र पहनना, स्त्री संगम करना अच्छा लगता है । जिसे वेदना ही नहीं, उसे यह भोगरूप इलाज कैसे सुख करेगा? अत: पाँच इन्द्रियों के विषय सुखरूप नहीं हैं । जिसने निराकुलता लक्षण, वेदनारहित, स्वाधीन, अंतरहित, अप्रमाण, आत्मिक सुख का अनुभव नहीं किया, वह पुरुष विषयों के लिए दीन हुआ, दु:ख को ही सुख मानता है । ये भोगसंपदा अभिमान बढाते हैं, मद उत्पन्न करते हैं, अपने रूप को भुलाते हैं, दीनता कराते हैं, इसलिए दु:ख ही है । इसप्रकार वस्तु का यथार्थ स्वरूप जानने वाला सम्यग्दृष्टि ऐसा चिंतवन करता है कि परद्रव्य मेरा कदापि नहीं हो सकता, मैं चेतन, ये विषय जडरूप, मेरा इन दु:खकारी विषयों से क्या संबंध? मैं अनंतज्ञान, अनंतसुखरूप हूँ । मुझे इनके कारण अनादिकाल से दु:ख हुआ, अत: मुझे इंद्र-अहमिंद्र लोक की संपदा भी महादु:खरूप, बंधनरूप भासती है । ऐसा चिंतवन करते हुए सम्यग्दृष्टि आगामी वांछारूप निदान नहीं करते । इस तरह चार प्रकार के आर्तध्यानों का संक्षेप में वर्णन किया । जीवों के अभिप्राय असंख्यात प्रकार के हैं तथा अनंत जीवों की अपेक्षा अनंत परिणाम हैं । उस अपेक्षा से आर्तध्यान के असंख्यात और अनंत भेद हैं, उन्हें जानने को भगवान केवली ही समर्थ हैं, अन्य कोई समर्थ नहीं है । ये आर्तध्यान रागी-द्वेषी-मोही जीवों को कभी रमणीक भासते हैं, तथापि परिपाक काल में अपथ्य भोजन के समान महा दु:ख उत्पन्न करने वाले हैं, कृष्णादि अशुभ लेश्याओं के बल से उत्पन्न होते हैं । पंचम गुणस्थान पर्यंत तो चारों भेद होते हैं और प्रमत्त गुणस्थान के धारक के निदान नाम का आर्तध्यान नहीं होता । तीन भेद छठवें गुणस्थानपर्यंत कदाचित् होते हैं, परन्तु सम्यग्दृष्टि को स्व-पर पदार्थ का सम्यग्ज्ञान है, अत: कषायों की मंदता से कदाचित् किंचित्मात्र होता है, लेकिन जैसा विपरीतग्राही मिथ्यादृष्टि के तिर्यंच गति का कारण होता है, तैसे नहीं होता । अनादिकालीन संक्लेश परिणामों के संस्कार से प्राणियों को बिना प्रयत्न के ही आर्तध्यान होते हैं और अनंतदु:खों सहित तिर्यंचगति में परिभ्रमण होना इसका फल है । इसका अन्तर्मुहूर्त काल है, अन्तर्मुहूर्त बाद अन्य आर्त-रौद्र ध्यान पलटते रहते हैं । इसके बाह्य चिः इसप्रकार जानना - भयवान होना, शोकमग्न होना, चिन्ता करना, शंका करना, प्रमादी होना, कलह करना, भ्रमरूप होना, बारम्बार निद्रा आना, आलस्य आना, विषयों की उत्कंठा होना, अचानक अबुद्धिपूर्वक वचन बोल उठना, शरीर की जडता/मोटा होना, खेदरूप रहना, दीर्घ निश्वास लेना, हाहाकार कर उठना, बेखबर/बेहोश हो जाना इत्यादि अनेकप्रकार के संताप क्लेशरूप चिः आर्तध्यान के भगवान के परमागम में वर्णित किये गये हैं । इसलिए वीतराग भगवान का धर्म धारण करके आर्तध्यानरूप परिणामों को प्राप्त मत होओ ।
सदासुखदासजी