
तेणिक्क मोससारक्खणेसु तह चेव छव्विहारम्भे ।
रुद्दं कसायसहियं झाणं भणियं समासेण॥1712॥
हिंसा चोरी और झूठ का रक्षण एवं छह आरम्भ ।
इसप्रकार सकषाय ध्यान यह रौद्र ध्यान संक्षेप कहें॥1712॥
अन्वयार्थ : परधन हरण करने में, असत्य प्रवृत्ति कराने में, परिग्रह के रक्षण में, छह काय के जीवों को विराधने में रौद्र कषायसहित परिणाम होते हैं, यह संक्षेप में रौद्रध्यान का स्वरूप भगवान ने कहा है । अब यहाँ कुछ विशेष जानना - रौद्र/तीव्र कषायसहित परिणामों से उत्पन्न चिंतवन रौद्रध्यान है । वह हिंसानन्द, मृषानन्द, चौर्यानन्द, परिग्रहानन्द के भेद से चार भेद सहित है । इनमें से हिंसानन्द को कहते हैं - जिसका निरन्तर निर्दयी स्वभाव होता है, स्वभाव से ही क्रोधाग्नि से तप्तायमान होता है तथा धन के, बल के, ऐश्वर्य के, ज्ञान के, कुल के, जाति के, रूप के, कला विज्ञान, पूज्यता इत्यादिक के मद से उद्धत होकर जगत को तृण समान लघु देखता है तथा जिसकी बुद्धि पाप करने में प्रवीण होती है, महाकुशील खोटे स्वभाव का धारक होता है । धर्म का, पाप-पुण्य का, जीव का, परलोक का अभाव मानता है, वह नास्तिक मार्गी होता है । सबको एकब्रह्म रूप ही श्रद्धान कर परलोक का अभाव मानने वाला होता है । जीव का अभाव कहने वाला ऐसा ब्रह्माद्वैतवादी होता है । बाह्य समस्त पदार्थ ग्रहण/जानने में आते हैं, उनका अभाव कहने वाला ज्ञानाद्वैतवादी होता है । एक ज्ञान बिना अन्य सर्व अपने आत्मा के, पर के आत्मा के, स्वर्ग, नरक, नगर, ग्राम, पृथ्वी, आकाश, काल, पुद्गल के अभाव को कहने वाले ज्ञानाद्वैतवादी कहते हैं - जो ये सभी वस्तुएँ जगत में दिखती हैं, वह भ्रम है, एक ज्ञानमात्र ही है । बाह्य वस्तुएँ भ्रम से जानने में आती हैं । वास्तव में ज्ञान बिना कोई पदार्थ ही नहीं तथा पृथ्वी, जल, अग्नि, पवनरूप भूतचतुष्टय से आत्मा की उत्पत्ति मानकर परलोक का, पुण्य-पाप का अभाव मानने वाले चार्वाक मत के धारक भी नास्तिक ही हैं । ये ब्रह्माद्वैतवादी तथा चार्वाक नास्तिक परलोक का अभाव कहने वाले, जीव के घात में, मांसभक्षण करने में पाप नहीं मानते हैं । ये हिंसा में आनंद मानते हैं, हिंसानन्दी नाम के रौद्रध्यान में प्रवतर्ते हैं । स्वयं के द्वारा या पर के द्वारा प्राणियों के समूह का नाश होता है या उन्हें पीडा होती है, उनका विध्वंस होने में हर्ष मानना हिंसानन्दी नाम का रौद्रध्यान है । जिसे हिंसा के कर्म करने में प्रवीणता होती है, पाप का उपदेश देने में निपुणता होती है, नास्तिक मत में जो निपुण होता है, दिन प्रतिदिन हिंसा में आसक्ति, निर्दयी जनों के संग में बसना, स्वाभाविक ही क्रूरता को प्राप्त होना, वह हिंसानन्द नाम का रौद्रध्यान है । जिसे ऐसा विचार रहता है कि ये जो मेरे वैरी, दाइयादार/हिस्सेदार इन दुष्ट मनुष्यों का मरण किस उपाय से हो? इनको मारने में कौन समर्थ है? इनको मारने का किसे राग है? इनसे किसका वैर है? ये कब मारे जायेंगे? ऐसे किसी निमित्त को जानने वाले ज्योतिषियों से पूछने का चिंतवन करना, ये मर जायें या इनको कोई मार डाले तो हम बहुत ब्राह्मणों को भोजन करायेंगे तथा अनेक देवताओं का महा उत्सवसहित पूजन करेंगे या बहुत दान देंगे - ऐसा चिंतवन करना, वह हिंसानंदी नाम का रौद्रध्यान है । जिसे जल के जीवों को मारने में कौतुक होता है, हर्ष होता है, आकाश में गमन करने वाले काक, चील, चिडिया, तोता आदि अनेक पक्षियों के मारने में उत्साह होता है । जिसे पृथ्वी पर विचरण करने वाले मृग, सूकर, सिंह, व्याघ्रादि को मारने का उपाय, उत्साह तथा चिंतवन होता है । जीवों को शस्त्र से मारने में, बाणों से बेधने में, परस्पर लडाने में, चमडी निकालने में, जीवों के नेत्र उखाडने में, नख उखाडने, जिह्वा निकाल लेने में, इन्द्रिय काटने में, अग्नि में दग्ध कर देने में, जल में डुबो देने में, पर्वतादि से गिरा देने में, नासिका छेदने में, हस्त-पाद काटने में, समस्त कुटुम्बियों को मारने में, अनेक प्रकार के ताडन, मारण, छेदनादि द्वारा त्रास देने में हर्ष होता है, कौतुहल उत्पन्न होता है - इत्यादि उपाय करना, वह सब हिंसानंदी नाम का रौद्रध्यान है । संग्राम में इसकी जीत हो, इसकी हार हो - इत्यादि हिंसानन्दी नाम का रौद्रध्यान है । प्राणियों को मारण, तिरस्कार, अनेक प्रकार से ताडना देखकर या श्रवण करके या चिंतवन करके जो आनंद होता है, वह नरक को ले जाने वाला हिंसानंदी नाम का रौद्रध्यान है । इस वैरी ने मेरा अपमान किया है, धन हरण किया है, मेरे मित्रों तथा कुटुम्बियों का घात किया है, मेरी आजीविका हरण की है, बिगाडी है, मेरी जमीन-जायदाद जबरदस्ती हर ली है, मेरी हँसी की है, गाली दी है, मेरी निंदा-अपवाद किया है । अब कोई देव की अनुकूलता मुझे इस समय में मिल जाये या कोई मेरा सहायक हो जाये तो इसको अनेक प्रकार से त्रास देकर मारूँ । मैं अपना बदला लूँ, तभी मेरा जीना सफल होगा, वह दिन धन्य होगा - ऐसा चिन्तवन करता रहता है, उसे हिंसानंदी नाम का रौद्रध्यान होता है । क्या करूँ? मेरी शक्ति बिगड गई/घट गई है, मेरा कोई सहायक नहीं रहा, धन भी नहीं रहा, समय भी खराब आ गया है, इसलिए ये मेरे वैरी हैं । इनका नाम सुनता हूँ और इनका उदय देखता हूँ, तब मेरे हृदय में अग्नि जलती है, दाह उत्पन्न होता है । अभी मेरा समय नहीं है, समय आयेगा तो इसको ऐसे कैसे रहने दूँगा? परभवपर्यंत मारूँगा, ऐसा चिंतवन करना हिंसानंद है । इस दुष्ट वैरी का नाश होओ । इसके स्त्री-पुत्र मर जाओ । इसका मूल से विनाश हो जाओ । इसने मुझे दु:ख दिया है, इसे ईश्वर दु:ख देगा - ऐसा चिंतवन करना वह हिंसानन्दी नाम का रौद्रध्यान है तथा दूसरे जीवों के दु:ख, आपदा, अपमान अपकार देखकर मन में आनन्द मानना, अन्य जीवों को विघ्न आने पर आनंद मानना, वह हिंसानन्द नाम का रौद्रध्यान है । दूसरे जीवों का सुख देखकर, गुण देखकर, दूसरे जीवों का यश सुनकर या ऊँचा देखकर परिणामों में संक्लेश करना, ईर्ष्या करना, वह हिंसानंदी नाम का रौद्रध्यान है । पृथ्वी का आरंभ करके हर्ष करना । जल का आरंभ करके, जल छिडका करके, जल में डूबना-तैरना इत्यादि में आनंद मानना । अग्नि का आरंभ, पवन का आरंभ, वनस्पति का आरंभ - छेदकर, फुलेल, पुष्पमालादि का आरंभ, अनेक बागों में, वनों में विहार करके आनंद मानना । इतर, फुलेल, पुष्पमालादि का आरंभ करके हर्षित होना । कामसेवन करके हर्षित होना । अभक्ष्य भक्षण करके हर्षित होना । विवाहादि महाहिंसा का आरंभादि का आरंभ करके आनन्द मानना तथा सुन्दर भोजन, वाहन, गमन-आगमन करके आनंद मानना - यह समस्त हिंसानंदी नाम का रौद्रध्यान है । अधिक कहने से क्या? संसारी जीवों को जो हिंसा के विकल्प हैं, वे सभी हिंसानन्दी नाम का रौद्रध्यान है । हिंसा के कारण आयुधादि उपकरण ग्रहण करना तथा हिंसक जीव जो श्वान, बिल्ली, चीता, सिंह, व्याघ्र, बाज, सिकरा/बारहसिंगा, चिडिया, काक, चील, सूआ-तोता, मैना, तीतर, कूकडा/मुर्गा इत्यादि दुष्ट जीवों को पालना, रक्षा करना, लडवाना, प्रीति करना - यह सब हिंसानंदी दुर्ध्यान है । अब मृषानन्दी नाम का दूसरा रौद्रध्यान कहते हैं । असत्य कल्पना से जिसका चित्त मलिन है, उसके मृषानन्दी नाम का रौद्रध्यान होता है । मुझ में ऐसा सामर्थ्य है कि लोगों को कपट के शास्त्रों से अनेक हिंसादि के मार्ग में लगाकर बहुत धन-उपार्जन करके इन्द्रियजनित सुख भोगूँ । मैं अपनी वचन-कला के प्रभाव से सच्चे को झूठा कर दूँगा और झूठे को सच कर दूँगा । वचन चातुर्य के बल से लोगों के धन तथा हाथी, घोडे, वस्त्र, स्वर्ण, आभरण, ग्राम, रूपवती कन्या ग्रहण करूँगा । ऐसा जिसका चिंतवन होता है, वह मृषानन्दी रौद्रध्यान का धारक है तथा असत्य की सामर्थ्य से राजाओं से, चोरों से, जो मेरे वैरी हैं, उनका घात कराऊँगा । जो निर्दोष हैं, उनके दोष प्रगट कर दूँगा, जो चोरी नहीं करते हैं, तिनको चोर प्रकट कर दूँगा । शीलवन्तों को जगत में कुशीली दिखा दूँगा, धन का नाश करा दूँगा, बन्दीगृह में अनेक प्रकार के बंधनों से मारण के त्रास - दु:ख भुगताऊँगा - इत्यादि चिंतवन करना मृषानन्दी नाम का रौद्रध्यान है । झूठ बोलने में आनंद मानना, सत्यार्थ धर्म के तथा धर्म के धारकों को दोषी कहकर आनंद मानना, झूठ-हिंसा के पुष्ट करने वाले शास्त्र बनाकर आनन्द मानना, काम की कथा करके आनंद मानना, भोजन कथा से, स्त्रियों की कथा से तथा पापी जीवों का सामर्थ्य का वर्णन करके, हिंसा के आरंभ की प्रशंसा करके आनंद मानना, पाप कथा को श्रवण करके आनंद मानना, परनिन्दा, पर की चुगली वार्ता करने में, श्रवण करने में आनन्द मानना, चोर, दुष्ट म्लेच्छों की कथा करना, उनकी कला-चतुराई-सामर्थ्य की प्रशंसा करना - यह सब मृषानन्द नाम का रौद्रध्यान है । ये मनुष्य मूर्ख हैं, ज्ञानरहित हैं, हेय-उपादेय के विचार रहित हैं, इनको मैं अपने वचन चातुर्य से नवीन कुमार्ग में प्रवर्तन कराऊँगा, इत्यादि अनेक असत्य के संकल्प से जो आनन्द उत्पन्न होता है, वह दुर्गति में बहुत काल तक परिभ्रमण करने का कारण मृषानन्द नाम का रौद्रध्यान जानना । जो संसार के दु:खों से भयभीत हैं, वे अयोग्य वचन का स्वप्न में भी चिंतवन नहीं करते हैं । अब चौर्यानन्द नाम के रौद्रध्यान को कहते हैं । चोरी का उपदेश देने में निपुणता, चोरी करने में प्रबलपना - बहुत चोरी करता हो तथा चोरी करने के उपायों में ही जिसका चित्त रहता है, वह चौर्यानन्द रौद्रध्यान है । चोरी के लिये बारम्बार चिंतवन करना, चोरी करके बहुत हर्षित होना, चोरी करके किसी ने किसी का धन हरण किया हो, उसमें हर्षित होना, वह चौर्यानन्द है और जिसको ऐसा ही चिंतवन चलता रहता है कि अब मैं किसी शूरवीर पुरुष की सहायता पाकर तथा अनेकप्रकार के उपायों से लोकों के बहुत समय से संचित किये धन को ग्रहण करूँगा । ऐसा विचार करता है कि मुझे इसका धन कैसे हाथ लगेगा? कैसे ये अचेत गाफिल होगा? अथवा कोई मर्म को जानने वाला मेरे साथ हो जाये तो मेरे हाथ बहुत धन लग जायेगा, ऐसा चिंतवन वह चौर्यानन्द है । किसी तरह से किसी का गडा धन मेरे हाथ लग जाये या भूला-पडा हुआ, किसी भी प्रकार से परधन आ जाये, तब तो मेरा जीना, बुद्धि-कुलादि सभी सफल हैं । जगत में न्याय से किसी के धन नहीं आता, जगत में जो सुख देखते हैं, वह तो पर के धन से ही है और अन्याय से धन आता है । उसमें बहुत पुरुषार्थ या भाग्य या बुद्धि की तीव्रता मानकर आनंद करना तथा बहुत कीमत की वस्तु अल्प कीमत में लेकर आनन्द मानना, इत्यादि समस्त चौर्यानन्द रौद्रध्यान साक्षात् नरकगति का कारण है । अब परिग्रहानन्द रौद्रध्यान को विशेष रूप से कहते हैं । जो पुरुष बहुत आरम्भ में तथा बहुत परिग्रह में, उसकी रक्षा के लिये उद्यम करता है और बहुत परिग्रह हो तब अपने को धन्य माने - कृतार्थ माने । मैं राजा हूँ, प्रधान हूँ - ऐसा मानना परिग्रहानन्द रौद्रध्यान है । और ऐसा विचार करता है कि मैं पुरुषों में प्रधान पुरुष हूँ । जैसा ऐश्वर्य मेरा है, वैसा और किसी का नहीं, मैंने बडे पुरुषार्थ से अनेक वैरियों को मार कर यह वैभव इकट्ठा किया है, अपने घर में स्थित अनेक प्रकार की सामग्री तथा महल, उद्यान, रत्न, सुवर्ण, स्त्री, पुत्र, वस्त्र, शय्या, आसन, असवारी, पयादे, सेवक - इन्हें देखकर विचार कर आनंद मानना परिग्रहानन्द रौद्रध्यान है । परिग्रह बढाकर आनंद मानना, वह दुर्गति का कारणभूत परिग्रहानन्द दुर्ध्यान है । इसका विशेष वर्णन परिग्रहत्याग महाव्रत में कह ही आये हैं । यहाँ विशेष लिखने से कथन बढ जाता है । ये चार प्रकार के राैद्रध्यान कृष्ण लेश्या से सहित हैं, इनका फल नरक में जाना है । क्रोध की तीव्रता से क्रूर वचन बोलना, दूसरों को ठगने में कुशलता, कठोरता, निर्दयता - ये रौद्रध्यान के चिः हैं । अग्नि के फुलिंगों समान नेत्रों का होना, भ्रकुटी को वक्र करना, भयानक आकृति द्वारा शरीर का कंपन होना, पसेव आ जाना इत्यादि रौद्रध्यान से देह में चिः प्रगट होते हैं । यह रौद्रध्यान क्षायोपशमिक भाव रूप है, इसका काल अन्तर्मुहूर्त है, यह दुष्ट अभिप्राय के वश से होता है । खोटे अवलम्बन से उत्पन्न होता है, धर्मरूप वृक्ष को दग्ध करने वाला है, जिसका अन्त:करण परिग्रह, आरम्भ, कषाय आदि से मलिन होता है, उससे उत्पन्न होता है, यह देशविरत गुणस्थान पर्यंत होता है । ऐसे संसार-परिभ्रमण के कारणभूत आर्त-रौद्रध्यान को जानकर इनका त्याग करके परिणाम उज्ज्वल करना श्रेष्ठ है ।
सदासुखदासजी