
अवहट्ट अट्टरुद्द महाभये सुग्गदीए पच्चूहे ।
धम्मे सुक्के य सदा होदि समण्णागदमदीओ॥1713॥
महाभयंकर सुगति विनाशक आर्त रौद्र दोनों दुर्ध्यान ।
इन्हें त्यागकर सुबुध क्षपक ध्याते हैं धर्म और शुक्लध्यान॥1713॥
अन्वयार्थ : नरकादि को प्राप्त कराने वाले होने से महान भय के करने वाले और शुभगति को नष्ट करने को महाविघ्न के कारण ऐसे आर्त-रौद्र दोनों दुर्ध्यानों को त्याग कर और धर्मध्यानशु क्लध्यान में सम्यग्बुद्धि को प्राप्त करनेवाले सदाकाल होओ ।
सदासुखदासजी