पं-सदासुखदासजी
किंचिवि दिट्ठिमुपावत्तइत्तु झाणे णिरुद्धदिट्ठीओ ।
अप्पाणम्मि सदिं संधित्ता संसारमोक्खट्ठं॥1715॥
बाहर से निज दृष्टि हटाकर करें ध्यान में चित एकाग्र ।
मात्र आत्मा का ही चिन्तन उसमें ही श्रुत अनुसन्धान॥1715॥
सदासुखदासजी