पं-सदासुखदासजी
पच्चाहरित्तु विसयेहिं इंदियेहिं मणं च तेहिंतो ।
अप्पाणम्मि मणं तं जोगं पणिधाय धारेदि॥1716॥
मन अरु इन्द्रिय को विषयों से दूर हटाकर निज परिणाम ।
शुद्ध आत्मा में ही मन को स्थापित कर धरता ध्यान॥1716॥
सदासुखदासजी