+ अब संसार भावना का अठ्ठाईस गाथाओं में वर्णन करते हैं - -
मिच्छत्तमोहिदमदी संसार महाडवी तदोदीदि ।
जिणवयणविप्पणट्ठो महाडवीविप्पणठ्ठो वा॥1777॥
इस संसार महा अटवी में मिथ्यामति से मोहित जीव ।
जिनवचरूपी मार्ग भूलकर घोर विपिन में भ्रमे सदीव॥1777॥
अन्वयार्थ : मिथ्यात्व से जिसकी बुद्धि मोहित हुई है, अचेत हुई है और जिनेन्द्र के वचनों के अवलंबन रहित ऐसा पुरुष संसाररूप महावन में मिथ्यात्व के प्रभाव से परिभ्रमण कर रहा है । जैसे कोई महावन में मार्ग को भूला व्यक्ति परिभ्रमण करता हुआ नष्ट होता है - मरण को प्राप्त होता है । तैसे ही भ्रमण करता हुआ यह आत्मा निगोद को प्राप्त होता है । कैसा है निगोद? जिसमें से अनंतकालपर्यंत निकलना कठिन है ।

  सदासुखदासजी