
तह्मा णीया पुरिसस्स होंति साहू अणेयसुहहेदु ।
संसारमदीणंता णीया य णरस्स होंति अरी॥1776॥
अतः सुखों में हेतुभूत सज्जन ही सच्चे बन्धु-समान ।
और डुबायें भव-समुद्र में वे परिजन हैं शत्रु-समान॥1776॥
अन्वयार्थ : साधुजन संसारी जीवों को रत्नत्रय धर्म में उद्यम कराते हैं तथा तीव्र दु:ख के कारण असंयमभाव का त्याग कराते हैं । इसलिए अनेक सुख के हेतु होने से निज बांधव मित्र तो वीतरागी साधु हैं । और अनेक दु:ख के कारण संसार में प्राप्त करने वाले अपने निज स्त्री, पुत्र, मित्र, बांधवादि हैं; वे अपने शत्रु होते हैं । अत: हे भव्य! तुम सभी से अन्यत्वपने का चिंतवन करो । यह आत्मा स्वभाव से ही शरीरादि से विलक्षण है । यद्यपि अनादि से शरीरादि के साथ एक हो रहा है तो भी क्षीर-नीर के समान शरीरादि अचेतन से चिदानन्द आत्मा भिन्न है । शरीर अचेतन, आत्मा चेतन - इनका दोनों का एकरूप बंध हो रहा है तो भी वस्तु स्वभाव से एक नहीं है - भिन्न ही हैं । इनका सुवर्ण और किट्टिकालिमा के समान अनादि से मिलाप होने पर भी भिन्नता प्रगट है । इस जगत में मोह के प्रभाव से अमूर्तिक-क्रियावान वे तन इस मूर्तिक और चेतनारहित शरीर को धारण किये हुए हैं । प्राणियों का शरीर तो अनेक पुद्गल परमाणुओं का पिंड रूप है और आत्मा उपयोग स्वरूप अतीन्द्रिय ज्ञान-दर्शनमय है । इसलिए भो ज्ञानीजन हो! जो जन्म में, मरण में प्रत्यक्ष भिन्न प्रतीति में आता है, उनका अन्य-अन्यपना तुम्हें नहीं दिखाई कैसे देता ? मूर्तिक और अचेतन तथा अनेक प्रकार से भिन्नभि न्न परिणमन करते हुए परमाणुओं से रचा यह शरीर है, इसका आत्मा से कहाँ संबंध है? इसलिए अपने शुद्ध ज्ञानानंद आत्मा से शरीर को अन्य जानना ही सत्यार्थ है और जब देह ही अन्य है, तब प्रगटरूप से बाह्य स्त्री, पुत्र, मित्र, धन-धान्यादि से एकपना कैसे हो? प्रगट ही आबाल-गोपालादि जो अन्यरूप ही दिखते हैं । जो चेतन-अचेतन पदार्थ का संबंध होता है, वह समस्त अपने आत्मस्वरूप से विलक्षण है । पुत्र, मित्र, कलत्र तथा धन, धान्य, ऐश्वर्य, जाति, कुल, ग्राम, नगर - ये प्रतिक्षण अपने स्वरूप से अन्य स्वभावरूप हैं - ऐसा चिंतवन करो । संसार में पुत्र अन्य है, पिता अन्य है, माता अन्य है, स्त्री अन्य है, इत्यादि जितने भी दृष्टिगोचर दिखते हैं, वे सभी अन्य-अन्य हैं । इस प्रकार अन्यत्वभावना का वर्णन किया ।
सदासुखदासजी