पं-सदासुखदासजी
हिंसादिदोसमगरादिसावदं दुविहजीवबहुमच्छं ।
जाइजरामरणोदयमणेय जादीसुदुम्मीयं॥1779॥
हिंसादिक हैं दोष मगर, अरु त्रस स्थावर मच्छ अनन्त ।
जन्म-जरा-मृतरूप लहर हैं विविध जाति की उठें तरंग॥1779॥
सदासुखदासजी