
दुविहपरिणामवादं संसारमहोदधिं परमभीमं ।
अदिगम्म जीवपोदो भमइ चिरं कम्मभण्डभरो॥1780॥
महाभयानक भवसागर में राग-द्वेष की पवन चले ।
कर्म-भार से भरा जीवरूपी जहाज चिरकाल भ्रमे॥1780॥
अन्वयार्थ : ज्ञानावरणादि कर्मरूप भांड वस्तुओं से भरा यह जीवरूपी जहाज, वह संसाररूप समुद्र को प्राप्त होकर, चिरकाल/अनंत कालपर्यंत परिभ्रमण कर रहा है । कैसा है संसार- समुद्र? बहुत तीव्र दु:ख ही है जल जिसमें और अनंतकाय/निगोद में प्रवेश करना ही है पाताल जिसमें । द्रव्य, क्षेत्र, काल, भावरूप जो चार परिवर्तन और भवसहित पंच परिवर्तन ही हैं भँवरें जिसमें! और चार गति रूप है पट्टण जिसमें और अन्त नहीं है जिसका, और हिंसादिक दोष ही हैं मगरादिक दुष्ट जीव जिसमें और त्रस-स्थावर जीव ही हैं मच्छ जिसमें, और जन्म-जरा-मरण ही है जल जिसमें, अनेक जाति की सैकडों ही हैं लहरियाँ जिसमें, दो प्रकार के परिणाम ही हैं पवन जिसमें और महाभयानक है रूप जिसका, ऐसे संसार-समुद्र में जीव अनंत कालपर्यंत भ्रमण करता है ।
सदासुखदासजी