अत्थाण वंजणाण य जोगाणं संकमो हु वीचारो ।
तस्स अभावेण तयं झाणं अविचार मिति वुत्तं॥1892॥
व्यंजन अर्थ योग में परिवर्तन वीचार कहलाता है ।
इस विचार बिन ध्यान सूत्र में अवीचार कहलाता है॥1892॥
अन्वयार्थ : तीन योगों में से एक योग के द्वारा एक द्रव्य को, क्षीणकषाय जो समस्त मोह का नाश करके क्षीणकषाय नाम के बारहवें गुणस्थान का धारक ध्याता है । इस कारण से इस ध्यान को एकत्व कहते हैं । प्रथम ध्यान के समान अनेक द्रव्यों का अनेक योगों से ध्याना नहीं होता । इस ध्यान में एक योग से एक द्रव्य को ध्याता है, इसलिए इसे एकत्व कहते हैं । वितर्क नाम श्रुत का है, क्योंकि पूर्व के अर्थ को जानने वाले इस ध्यान को ध्याते हैं । इससे इसे सवितर्क कहते हैं । अर्थों के व्यंजनों के और योगों के पलटने को वीचार कहते हैं । इस ध्यान में अर्थ, व्यंजन, योगों का पलटना नहीं होता, इसलिए इस ध्यान को अवीचार कहा है ।

  सदासुखदासजी