पं-सदासुखदासजी
जम्हा सुदं वितक्कं जम्हा पुव्वगदअत्थकुसलो य ।
ज्झायदि ज्झाणं एवं सवितक्कं तेण तं ज्झाणं॥1891॥
श्रुतज्ञान में कहे अर्थ में कुशल मुनीश्वर धरते ध्यान ।
श्रुतज्ञान ही है वितर्क इसलिए कहें सवितर्क महान॥1891॥
सदासुखदासजी